लैंगिक पहुँच और सुरक्षा

भारतीय शहरों में महिलाएँ एक आवागमन संकट का सामना करती हैं, जिसकी जड़ सार्वजनिक जीवन में उनकी आवाजाही पर पितृसत्तात्मक नियंत्रण में है। अध्ययनों के अनुसार शहरी भारत में महिलाओं की गतिशीलता दर महज़ 47% तक है, और लगभग आधी शहरी महिलाओं को अकेले बाहर निकलने की "अनुमति" नहीं होती। ट्रांसजेंडर व्यक्ति और अन्य लैंगिक अल्पसंख्यक सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन तक पहुँच की कमी बताते हैं। बस का डिज़ाइन, स्टॉप का स्थान, सेवाओं का समय, रोशनी और शौचालय का होना या न होना, और स्टाफ़ व सहयात्रियों का व्यवहार — ये सब तय करते हैं कि महिलाएँ स्वतंत्र, सुरक्षित और सम्मान के साथ चल पाती हैं या नहीं। किराया एक बड़ी बाधा है, पर हम लैंगिक पहुँच के पूरे दायरे पर काम करते हैं ताकि सार्वजनिक परिवहन महिलाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए सचमुच समावेशी बन सके।

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